यदा-यदा हि धर्मस्य से विदुर नीति तक—प्रकृति संरक्षण और जनकल्याण का संदेश लेकर बिजनौर पहुंचे पूर्व आईएएस डॉ. दिनेश चन्द्र सिंह

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रिपोर्टर : दीपक शुक्ला
बिजनौर। पूर्व आईएएस अधिकारी डॉ. दिनेश चन्द्र सिंह ने अपने गृह जनपद बिजनौर पहुंचकर ऐतिहासिक, पौराणिक एवं आध्यात्मिक स्थलों का दर्शन किया। इस दौरान उन्होंने विदुरकुटी पहुंचकर महात्मा विदुर के मंदिर में पूजा-अर्चना की और क्षेत्र की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत को नमन किया। उन्होंने कहा कि जनकल्याण का वास्तविक मार्ग प्रकृति के संरक्षण से होकर ही आगे बढ़ता है।

डॉ. सिंह ने कहा कि प्रशासनिक सेवा के दौरान विभिन्न जनपदों में कार्य करने से उन्हें जनसेवा और प्रकृति संरक्षण के महत्व को करीब से समझने का अवसर मिला। वह गौमाता एवं गौवंश के संरक्षण तथा पशुओं के लिए हरे चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करने की दिशा में भी लोगों को जागरूक करते रहे हैं। नैपियर घास के रोपण को लेकर भी उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता अभियान चलाने पर जोर दिया।

बिजनौर की गौरवशाली विरासत को किया नमन

डॉ. सिंह ने बिजनौर की पौराणिक एवं ऐतिहासिक विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि यह धरती प्राचीन स्मृतियों और सांस्कृतिक परंपराओं को अपने भीतर समेटे हुए है। उन्होंने महाभारत एवं अभिज्ञान शाकुंतलम् से जुड़ी परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना में बिजनौर का विशिष्ट स्थान रहा है।

उन्होंने कहा कि आज बिजनौर ज्ञान, विज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में भी अपनी पहचान बना रहा है। यहां के लोगों की सरलता के साथ उनकी प्रतिभा, परिश्रम और मेधा ने न्यायिक, प्रशासनिक, वैज्ञानिक, कृषि और फिल्म जगत सहित अनेक क्षेत्रों में उन्हें विशिष्ट पहचान दिलाई है।

अपने गृह जनपद की धरती पर लौटने को उन्होंने भावनात्मक और आध्यात्मिक अनुभव बताते हुए नागरिकों, माता-पिता, गुरुजनों और मातृभूमि को नमन किया।

महात्मा विदुर की तपोभूमि को किया नमन

विदुरकुटी के ऐतिहासिक महत्व का उल्लेख करते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि महात्मा विदुर ने महाभारत काल में न्याय और धर्म की रक्षा के लिए अधर्म का साथ न देने का संकल्प लिया था। महाराजा धृतराष्ट्र के साथ उनके संवाद आज भी ‘विदुर नीति’ के रूप में समाज को राजनीति, धर्म, न्याय और जीवन के अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।

उन्होंने कहा कि विदुरकुटी केवल एक ऐतिहासिक स्थल नहीं, बल्कि नैतिकता, न्याय और धर्म की प्रेरणा देने वाली तपोभूमि है। इस पवित्र भूमि को नमन करना उनके लिए गौरव की अनुभूति है।

गंगा की अविरलता और निर्मलता बनाए रखने का आह्वान

डॉ. सिंह ने मां गंगा को नमन करते हुए कहा कि राजा भगीरथ के प्रयास से गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ और सदियों से मां गंगा जनकल्याण की धारा के रूप में मानव जीवन को समृद्ध करती आ रही हैं।

उन्होंने गंगा की अविरलता, निर्मलता और पवित्रता बनाए रखने को समाज की सामूहिक जिम्मेदारी बताया। उन्होंने कहा कि गंगा केवल नदी नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आस्था और जीवनधारा का अभिन्न हिस्सा हैं।

प्रकृति संरक्षण को बताया जनकल्याण का आधार

डॉ. सिंह ने कहा कि औद्योगिक एवं वैज्ञानिक विकास ने मानव जीवन को सरल और गतिशील बनाया है। यातायात और तकनीक ने दूरियां कम की हैं, लेकिन विकास की इस गति के साथ प्रकृति का संतुलन बनाए रखना भी बेहद जरूरी है।

उन्होंने कहा कि यदि प्रकृति का संरक्षण नहीं किया गया तो विकास की यही गति भविष्य में मानव जीवन के लिए चुनौती बन सकती है। इसलिए वृक्षारोपण, पर्यावरण संरक्षण, वन्यजीवों की रक्षा और गौवंश संरक्षण को जनकल्याण के व्यापक अभियान से जोड़ना होगा।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि “जनकल्याण का मार्ग प्रकृति के संरक्षण से ही आगे बढ़ेगा।”

विज्ञान और साहित्य ने दी नई जीवन-दृष्टि

अपने जीवन के अनुभव साझा करते हुए डॉ. सिंह ने बताया कि उन्होंने विज्ञान विषय से शिक्षा प्राप्त की तथा केमिस्ट्री में डॉक्टरेट की उपाधि हासिल करने के साथ सीएसआईआर के रिसर्च फेलो के रूप में भी कार्य किया। वहीं हिंदी साहित्य के अध्ययन और उसके सानिध्य ने उन्हें जीवन को देखने की नई दृष्टि प्रदान की।

उन्होंने कहा कि प्रशासनिक सेवा के दौरान प्राप्त अनुभवों को पुस्तकों के माध्यम से अभिलेखित करने का प्रयास किया है, ताकि आने वाली पीढ़ियां प्रशासनिक चुनौतियों, आपदा प्रबंधन और जनसेवा से जुड़े अनुभवों से सीख सकें।

कोरोना काल की कठिन परिस्थितियों, आपदा प्रबंधन और महाकुंभ-2025 के अनुभवों एवं योगदान को उन्होंने अपनी पुस्तकों में स्थान दिया है। ‘काल प्रेरणा’, ‘कर्म निर्णय’ और ‘कर्मकुंभ-2025’ के माध्यम से उन्होंने अपने प्रशासनिक अनुभवों एवं अनुभूतियों को शब्दबद्ध किया है।

प्रकृति के सानिध्य ने दी नई प्रेरणा

विदुरकुटी क्षेत्र में चौधरी उदयवीर सिंह के साथ भ्रमण के दौरान डॉ. सिंह ने वहां विकसित किए जा रहे सुंदर स्थल का भी अवलोकन किया। उन्होंने कहा कि प्रकृति के सानिध्य में रहकर उन्हें प्रकृति-बोध और जनचेतना के लिए आगे बढ़ने की नई प्रेरणा मिली है।

उन्होंने कहा कि आधुनिक विकास के साथ समाज को प्रकृति के प्रति भी संवेदनशील बनना होगा। वृक्ष, जल, वन्यजीव, गौवंश और पर्यावरण के संरक्षण को जीवन का हिस्सा बनाकर ही स्वस्थ, संतुलित और समृद्ध समाज का निर्माण किया जा सकता है।

अंत में डॉ. दिनेश चन्द्र सिंह ने बिजनौर की पवित्र धरती, यहां के नागरिकों, गुरुजनों और मातृभूमि को नमन करते हुए कहा कि प्रकृति, संस्कृति और जनकल्याण के प्रति जागरूकता ही आने वाले समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने “जय हिन्द, जय भारत” के उद्घोष के साथ अपनी बात समाप्त की।

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